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मात्रा

तालों में उनकी लम्बाई स्पष्ट करनें वाली इकाई को "मात्रा" कहते हैं ।मात्रा ताल का ही एक  हिस्सा है ,क्योंकि मात्राओं के योग से ही समस्त तालों की रचना हुई  है । एक -सी लय या चाल में गिनती गिनने को मात्रा कह सकते हैं ।यदि घड़ी की एक सेकंड को हम एक मात्रा मान लें ,तो सोलह सेकंड में तीन ताल का ठेका बन जाएगा ,बारह सेकंड  में एकताल का ठेका बन जाएगा और दस सेकंड  में झपताल का ठेका बन जाएगा । लय.....ताल में एक क्रिया से दूसरी क्रिया के बीच की विश्रांति का काल ,जो पहली क्रिया का विस्तार है ,"लय" कहलाता है ।  मुख्य लय तीन प्रकार की होती हैं ......  1..विलंबित लय  2.....मध्य लय  3...द्रुत लय ..    

ताल -मात्रा -लय विवरण

ताल .....भरत मुनि नें संगीत में काल के नापने के साधन को 'ताल ' कहा है । जिस प्रकार भाषा में व्याकरण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार संगीत में ताल की आवश्यकता होती है ।   ताल शब्द 'तल'धातु से बना है । संगीत रत्नाकर के अनुसार, जिसमें गीत ,वाद्य और नृत्य प्रतिष्ठित होते हैं वह ताल  है । प्रतिष्ठा का अर्थ होता है....व्यवस्थित करना ,आधार देना या स्थिरता प्रदान करना । तबला ,पखावज इत्यादि ताल-वाद्यों से जब गाने के समय को नापा जाता है ,तो एक विशेष प्रकार का आनंद प्राप्त होता है व वास्तव में ताल संगीत की जान है ,ताल पर ही संगीत  की इमारत खडी हुई है ।      शुभा मेहता    6th ,Jan ,2025

स्वर और समय की दृष्टि से रागों के तीन वर्ग

उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में रागों के गानें -बजानें के बारे में  समय -सिद्धांत प्राचीन काल से ही चला आ रहा है । यद्यपि प्राचीन रागों में एवं अर्वाचीन रागों में समय सिद्धांत पर कुछ  मतभेद है । हमारे प्राचीन संगीत पंडितों नें रागों को उनके ठीक समय पर गायन -वादन का सिद्धांत अपने ग्रंथों में स्वीकार किया है ।  स्वर और समय  के अनुसार उत्तर भारतीय रागों के तीन वर्ग मानकर कोमल -तीव्र स्वरों के हिसाब से उनका विभाजन किया गया है ... 1... संघिप्रकाश राग अर्थात कोमल रे और ध वाले राग  2... शुद्ध रे और ध वाले राग  3...कोमल ग और नि वाले राग  1 ..... संघिप्रकाश राग.......इस वर्ग  के रागों में कोमल रे और कोमल ध वाले रागों को रखा जाता है ,साथ  ही इन रागों में ग शुद्ध होना आवश्यक है । दिन और रात की संधि अर्थात मेल होनें के समय को संधिकाल कहते हैं प्रातः सूर्योदय से कुछ पहले और शाम को सूर्यास्त से पहले का कुछ समय ऐसा होता है जिसे न तो दिन कह सकते हैं न ही रात इसी समय को संघिप्रकाश की बेला कहा जाता है । इस बेला में जो राग  गाए -बजाए जाते हैं उन्हे संघिप्रका...

रागों का समय विभाजन

उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में रागों का प्रयोग काल दिन और रात के चौबीस घंटों के दो भाग करके बाँटा गया है । पहला भाग बारह बजे दिन से बारह बजे रात्रि तक और दूसरा भाग बारह बजे रात्रि से बारह बजे दिन तक माना जाता है ।   पहले भाग  को पूर्व भाग और दूसरे भाग को उत्तर भाग कहते हैं । पूर्व राग ......जो राग दिन के बारह बजे से रात्रि के बारह बजे तक गाए -बजाए जाते हैं उन्हें पूर्व राग कहते हैं । उत्तर राग.....जो राग रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक गाए -बजाए जाते हैं ,उन्हें उत्तर राग कहते हैं । सप्तक के सात शुद्ध स्वरों में तार सप्तक का सां मिलाकर आठ की संख्या ली जाए और फिर इसके दो हिस्से कर दिए जाए तो 'सा,रे ,ग, म 'यह सप्तक का पूर्वांग हुआ और 'प,ध,नी,सां'यह सप्तक का उत्तरांग हुआ।  पूर्वांग वादी राग  ...जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में होता है वो पूर्वांग वादी राग कहलाते हैं । उत्तरांग वादी राग...जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में होता है वो उत्तरांग वादी राग कहलाते हैं । शुभा मेहता  17th ,Nov ,2024

वादी ,संवादी, अनुवाद और विवादी

राग के नियमों में वादी ,संवादी आदि स्वरों का भी महत्वपूर्ण यह स्थान होता है ।  वादी स्वर को राजा के समान, संवादी स्वर को मंत्री के समान, विवादी स्वर  को बैरी के समान और अनुवादी स्वर को सेवक के समान समझना चाहिए।  वादी स्वर.....राग में लगने वाले स्वरों में जिस स्वर पर सबसे अधिक जोर रहता है ,अथवा जिसका प्रयोग बार-बार   किया जाता है ,उसे राग  का वादी स्वर कहते हैं । संवादी स्वर....यह वादी स्वर का सहायक होता है ,तभी शास्त्रों नें इसे मंत्री की पदवी दी है । यह वादी स्वर से कम तथा अन्य स्वरों से अधिक प्रयुक्त होता है । वादी स्वर के चौथे या पाँचवे नम्बर पर संवादी स्वर होता है । अनुवादी.....वादी और संवादी के अतिरिक्त जो नियमित स्वर राग  में लगते हैं वे सब अनुवादी स्वर कहलाते हैं । विवादी  स्वर...विवादी का वास्तविक अर्थ होता है ..बिगाड पैदा करने वाला अर्थात ऐसा स्वर जिससे राग का स्वरूप बिगड जाए । लेकिन कुशल गायक कभी-कभी विवादी स्वर का प्रयोग राग इतनी सुन्दरता से करते हैं कि राग का सौंदर्य बढ जाता है । शुभा मेहता  17th Oct ,2024 

रागों के लक्षण

प्राचीन ग्रंथों में रागों के तीन भेद बताए गए हैं -- 1...शुद्ध  2...छायालग  3..संकीर्ण  1...जिस राग में अन्य किसी राग के स्वर लगनें पर भी उसकी छाया न पडनें पाए ,उसे" शुद्ध राग "कहते है । 2...दो रागों के मेल से अथवा किसी एक राग  में अन्य किसी राग  के स्वर आ जानें से दूसरे राग की जो छाया दिखाई  दे जाती है ,ऐसे राग  को" छायालग राग" कहते हैं । 3..जिस राग  में दो रागों से अधिक रागों का मिश्रण या मिलावट हो ,उसे" संकीर्ण राग" कहते हैं । रागों के आधुनिक दस लक्षण......... जिस प्रकार प्राचीन विद्वान जातियों के दस लक्षण मानते हैं ,उसी प्रकार आज भी रागों के दस लक्षण मानें जाते हैं । ये दस लक्षण क्रमानुसार ठाठ ,आरोह-अवरोह, जाति ,वादी -संवादी स्वर, पकड ,न्यास के स्वर, पूर्वागं या उत्तरांग की प्रधानता, गान समय ,आविर्भाव-तिरोभाव  और राग  का रस है । शुभा मेहता  14th Oct, 2024 .

राग

ध्वनि की उस विशिष्ट रचना को ,जिसमें स्वर तथा वर्णों के कारण सौंदर्य हो ,जो मनुष्य के चित्त का रंजन करे ,अर्थात जो श्रोताओं के मन को प्रसन्न करे ,बुद्धिमान लोग उसे राग कहते हैं ।    राग  में निम्नलिखित बातों का होना जरूरी है.....   1...राग किसी थाट से उत्पन्न होना चाहिए।    2... ध्वनि की एक विशेष रचना हो ।    3..उसमें स्वर तथा वर्ण हों ।    4...रंजकता यानि सुंदरता हो ।     5.. राग  में कम से कम पाँच स्वर अवश्य होनें चाहिए।        6...राग में एक स्वर के दो रूप पास-पास लेनें का शास्त्रकारों नें विरोध किया है ।   7....राग  में आरोह तथा अवरोह का होना आवश्यक  है क्योंकि इनके बिना राग का रूप पहचाना नहीं जा सकता । 8.... किसी भी राग में षडज स्वर वर्जित नहीं होता । 9...मध्यम और पंचम ,ये दो स्वर एक साथ तथा एक ही समय कभी भी वर्जित नहीं होते । 10...राग  में वादी संवादी स्वर अवश्य रहते हैं । इन स्वरों पर ही विशेष जोर रहता है । शुभा मेहता  13th Sep,2024